प्रस्तुत लेख पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन के बाद दिनांक 20/8/2018 को हुई श्रद्धांजलि सभा पर आधारित है।

अटल-आडवाणी

अटल जी के निधन के बाद सारा देश शोकाकुल था। देश की जनता, पक्ष-विपक्ष और अंतराष्ट्रीय जगत के नेतागण अटल जी के निधन पर अपना दुःख व्यक्त कर रहे थे, लेकिन इन सब के बीच जो एक शक्स था जिसे देश की जनता और नेतागण विशेष रूप से सुनना चाह रही थी, वो थे अटल जी के परम मित्रो में से एक आदरणीय ‘आडवाणी जी’ जिनकी राजनितिक पारी अटल जी के साथ शुरू हुई और शायद खत्म भी।
और जब श्रद्धांजलि सभा रखा गया तब वो समय आया जब लोग व्यग्रता से आडवाणी जी के मंच में जाने और उनको सुनने के लिए आतुर थे, और ऐसा हुआ भी, आडवाणी जी को बोलने के लिए मंच में आमंत्रित किया गया, और देश ने उनको सुना भी.
लेकिन क्या श्रद्धांजलि सभा में सचमुच ‘आडवाणी जी’ बोले थे?
हमने सुना पर पहली बार ऐसा लगा कि हम अडवाणी जी को सुन जरुर रहे थे पर ये वो ‘आडवाणी जी’ नहीं बोल रहे थे!

वो आडवाणी जी, जिनके भाषण में इतिहास,राजनीति,राष्ट्रनीति की गहरी बातें हुआ करती थी,वो आडवाणी जी जिनका भाषण सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर भाषा और शब्दों के चयन में बेजोड़ होता था,
बुलन्द, धाराप्रवाह, और सटिकता जिसके भाषण की खूबियाँ हुआ करती थी, यही वह आडवाणी जी थे जिन्होंने जब राम रथ निकाला तो उनके आकर्षक भाषण ने पुरे भारत में एक ऐतिहासिक आन्दोलन खड़ा कर दिया, उसी आन्दोलन के कारण आज पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है।
लेकिन श्रद्धांजलि सभा में उस आडवाणी जी की अनुपस्थिति स्पष्ट दिख रही थी!
मानो ऐसा लगा, आडवाणी जी पर वो दोस्त हावी हो गया, जो अटल का था।
उस दिन आडवाणी जी नहीं वो दोस्त बोल रहा था, एक साथी बोल रहा था।

वो साथी जो 65 सालो से दो शरीर और एक नाम बन गए थे।
वो नारा आज भी मुझे याद है जो हम दीवारों में अपने पैसे लगा-लगा कर लिखा करते थे।
“अटल-आडवाणी कमल निशान, माँग रहा है हिन्दुस्तान”
“हमने मन में ठाना है, अटल-आडवाणी लाना है”
“सबको देखा बारी-बारी अबकी बारी अटल बिहारी” इत्यादि-इत्यादि….

अटल जी के श्रद्धांजलि सभा में आडवाणी जी को सुन कर ऐसा लग रहा था कि मानो शायद वो खुद में थे ही नहीं,
पहली बार उनके शब्दों को लड़खड़ाते सुना!
वो खाने की बाते कर रहें थे, पकाने की बातें कर रहे थे, खिचड़ी की बाते कह रहे थे! अगर आपने सुना होगा वो भाषण तो गौर किया होगा कि उन्होंने एक लाइन को दो-दो बार दोहराया था!
जब वो कहते है…

‘मैंने जब पुस्तक लिखी थी, अपने जीवनी की, आत्म कथा की, उसमे अटल जी का उल्लेख था’
और फिर वो एक लाइन कहते है जिनको उन्होंने -दो बार कहा,वह थी….

“और इसीलिए जब उस पुस्तक का विमोचन हुआ और उसमे अटल जी नहीं आए, तो मुझे बहुत कष्ट हुआ”
इसी बात को बाद में उन्होंने दोबारा दोहराया!
जब वो कहते है “

“वो मुझे भोजन पका कर खिलाते थे फिर चाहे वो खिचड़ी सही, मै इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ की अगर एक दिन मैंने अपनी पुस्तक लिख कर के प्रकाशित की और सार्वजानिक रूप से मै उसको वितरित करूँगा ये घोषित किया”
फिर वो कहते है….

“और अटल जी उस दिन नहीं आ सके तो मुझे कितना दुःख हुआ की अटल जी मेरे पुस्तक के विमोचन के दिन भी नहीं आए”

क्या था ये!?

उन्होंने अटल जी के हमारे बीच नहीं होने की बात अलग-अलग शब्दों में बार-बार दोहराई, कई बार तो उनके भाषण में एक खामोशी का भी अहसास हुआ!
मानो आडवाणी जी खुद में नहीं थे, शायद वो कही और भी थे उस वक्त!

65 साल से ऊपर का जुड़ाव था दोनों का।
बात चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के तौर पर बिताये दिन हो,भारतीय जनसंघ की शुरवात हो,
आपात काल के वो काले महीने हो जिसके बाद ‘जनता पार्टी’ की स्थापना हुई और या फिर 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ की स्थापना।

इन सब दौरों में दोनों का साथ हमेशा बना रहा, राजनीति और जीवन के कई वसंत और पतझड़ दोनों ने साथ-साथ देखें, जब कभी उदास या खुश हुए तो कई पिक्चरें भी साथ-साथ देखीं।
आज अडवाणी जी अपने आप में एक जीता-जागता इतिहास है।

जैसे अटल जी के जाने के बाद सारे देश ने एक भाव से यह महसूस किया की उनका नेतृत्व और मार्ग दर्शन, देश को और मिल सकता था, अगर ऐसा होता तो यह देश और देशवासियों के लिए बहुत अच्छा होता, कल यही बात हम आडवाणी जी लिए भी महसूस करेंगे……..