एकलव्य

sanjeevvermasite.wordpress.com , एकलव्य

“कण-कण में राम” By Mohammad — October 4, 2018

“कण-कण में राम” By Mohammad

“वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाले मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुध्हिजिवियों को अपने उदार विचार छोड़ने की प्रेरणा दी। इसी कारण मस्जिद को हिंदुओं के लिए छोड़कर समस्या के समाधान के लिए सोच रहे मुसलमानों ने अपनी सोच में परिवर्तन कर लिया और मस्जिद नहीं देने के पक्ष में विचार करना शुरू कर दिया”।

babri

अयोध्या के स्वामित्व के संबंध में 1990 में राष्ट्रीय स्तर पर बहस ने जोर पकड़ा। इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या उत्खनन में भाग लेने का मुझे अवसर मिला। प्रो बीबी लाल के नेतृत्व में अयोध्या उत्खनन की टीम में ‘दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी’ के 12 छात्रों में से मैं एक था। उस समय के उत्खनन में मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। किसी ने इसे समग्रता के साथ नहीं देखा। एक पुरातत्वविद की ऐतिहासिक सोच के साथ हम लोगों ने उसे निस्संग होकर देखा। उत्खनन के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे। उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं-12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश आठ ऐश्वर्य चिन्हों में एक हैं।

 


1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, 14 स्तंभों को हमने देखा। पुलिस सुरक्षा में रही मस्जिद में प्रवेश मना था, लेकिन उत्खनन और अनुसंधान से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। उत्खनन के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। बाबर के सेनानायक मीर बकी द्वारा तोड़े गए या पहले से तोड़े गए मंदिरों के अंशों का उपयोग करके मस्जिद का निर्माण किया गया था। उत्खनन से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर, 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अंशों को मैंने स्वयं देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, परंतु राम जन्मस्थान पर विश्व हिंदू परिषद ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए नरमवादी मुसलमान तैयार थे, परंतु इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।

बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विहिप के पास फिर कोई मुद्दा नहीं होगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना होती। खेद के साथ कहना पड़ेगा कि उग्रपंथी मुस्लिम गुट की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मस्जिद नहीं छोड़ने का उपदेश दिया। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जेएनयू के केएस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ कहा। उनका साथ देने के लिए आरएस शर्मा, अनवर अली, डीएन झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब आदि भी आगे आए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आरएस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञों के रूप में कई बैठकों में भाग लिया।

इस कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रो इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक इस परिषद के कार्यालय में आयोजित करने का परिषद के तत्कालीन सदस्य सचिव एवं इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने विरोध भी किया, किंतु प्रो इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाले मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को अपने उदार विचार छोड़ने की पे्ररणा दी। इसी कारण मस्जिद को हिंदुओं के लिए छोड़कर समस्या के समाधान के लिए सोच रहे मुसलमानों ने अपनी सोच में परिवर्तन कर लिया और मस्जिद नहीं देने के पक्ष में विचार करना शुरू कर दिया। साम्यवादी इतिहासकारों के हस्तक्षेप से उनकी सोच में परिवर्तन हुआ। इस तरह समझौते का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। अगर समझौता होता तो हिंदू- मुस्लिम संबंध ऐतिहासिक दृष्टि से नए मोड़ पर आ जाते और कई समस्याओं का सामाजिक हल भी हो सकता था।

इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि मुस्लिमर्-ंहदू उग्रपंथी ही नहीं, साम्यवादी उग्रपंथी भी राष्ट्र के लिए खतरनाक हैं। पंथनिरपेक्ष होकर समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण करके एक बड़ा अपराध किया गया। इसके लिए राष्ट्र को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इतिहास अनुसंधान परिषद में समस्या का समाधान चाहने वाले थे, परंतु इरफान हबीब के सामने वे कुछ नहीं कर सके। संघ परिवार की असहिष्णुता को पाकिस्तान की असहिष्णुता और आइएस के निष्ठुर कार्यों से तुलना करने में इतिहास अनुसंधान परिषद के कई सदस्य सहमत नहीं होंगे, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् दो गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद तोड़ने से प्राप्त हुआ महत्वपूर्ण पुरातत्व अवशेष है-‘विष्णु हरिशिला पटल’। इसमें 11वीं-12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।

डॉ. वाईडी शर्मा और डॉ. केएन श्रीवास्तव द्वारा 1992 में किए गए निरीक्षण में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुशान जमाने (100-300 एडी) की मिट्टी की मूर्तियां प्राप्त हुईं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के निर्देशानुसार किए गए उत्खनन में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंट से बनाया चबूतरा दिखाई पड़ा। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन से प्राप्त हुई। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उप्र के निदेशक की रिपोर्ट में बताया गया कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े हुए 263 पुरातत्व अवशेष प्राप्त हुए। उत्खनन से प्राप्त सुबूतों और पौराणिक अवशेषों के विश्लेषण से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच भी इसी निर्णय पर पहुंची

babri_masjid_ram_temple

उत्खनन को निष्पक्ष रखने के लिए कुल 137 श्रमिकों में 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक मजिस्ट्रेट भी शामिल थे। उत्खनन को इससे ज्यादा निष्पक्ष कैसे बनाया जा सकता था? उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका मुख्य कारण यह था कि उन्होंने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के रूप में उत्खनन में भाग लिया था। इनमें तीन-चार को ही तकनीकी दृष्टि से पुरातत्व मालूम था।

प्रस्तुत लेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक “K.K. Muhammed” हैं और यह लेख उनकी हालिया पुस्तक- ‘मैं हूं भारतीय’ (प्रभात प्रकाशन) का एक संपादित अंश है।

Advertisements
हमने सुना,पर वो आडवाणी जी नहीं थे! — August 22, 2018

हमने सुना,पर वो आडवाणी जी नहीं थे!

प्रस्तुत लेख पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन के बाद दिनांक 20/8/2018 को हुई श्रद्धांजलि सभा पर आधारित है।

अटल-आडवाणी

अटल जी के निधन के बाद सारा देश शोकाकुल था। देश की जनता, पक्ष-विपक्ष और अंतराष्ट्रीय जगत के नेतागण अटल जी के निधन पर अपना दुःख व्यक्त कर रहे थे, लेकिन इन सब के बीच जो एक शक्स था जिसे देश की जनता और नेतागण विशेष रूप से सुनना चाह रही थी, वो थे अटल जी के परम मित्रो में से एक आदरणीय ‘आडवाणी जी’ जिनकी राजनितिक पारी अटल जी के साथ शुरू हुई और शायद खत्म भी।
और जब श्रद्धांजलि सभा रखा गया तब वो समय आया जब लोग व्यग्रता से आडवाणी जी के मंच में जाने और उनको सुनने के लिए आतुर थे, और ऐसा हुआ भी, आडवाणी जी को बोलने के लिए मंच में आमंत्रित किया गया, और देश ने उनको सुना भी.
लेकिन क्या श्रद्धांजलि सभा में सचमुच ‘आडवाणी जी’ बोले थे?
हमने सुना पर पहली बार ऐसा लगा कि हम अडवाणी जी को सुन जरुर रहे थे पर ये वो ‘आडवाणी जी’ नहीं बोल रहे थे!

वो आडवाणी जी, जिनके भाषण में इतिहास,राजनीति,राष्ट्रनीति की गहरी बातें हुआ करती थी,वो आडवाणी जी जिनका भाषण सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर भाषा और शब्दों के चयन में बेजोड़ होता था,
बुलन्द, धाराप्रवाह, और सटिकता जिसके भाषण की खूबियाँ हुआ करती थी, यही वह आडवाणी जी थे जिन्होंने जब राम रथ निकाला तो उनके आकर्षक भाषण ने पुरे भारत में एक ऐतिहासिक आन्दोलन खड़ा कर दिया, उसी आन्दोलन के कारण आज पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है।
लेकिन श्रद्धांजलि सभा में उस आडवाणी जी की अनुपस्थिति स्पष्ट दिख रही थी!
मानो ऐसा लगा, आडवाणी जी पर वो दोस्त हावी हो गया, जो अटल का था।
उस दिन आडवाणी जी नहीं वो दोस्त बोल रहा था, एक साथी बोल रहा था।

वो साथी जो 65 सालो से दो शरीर और एक नाम बन गए थे।
वो नारा आज भी मुझे याद है जो हम दीवारों में अपने पैसे लगा-लगा कर लिखा करते थे।
“अटल-आडवाणी कमल निशान, माँग रहा है हिन्दुस्तान”
“हमने मन में ठाना है, अटल-आडवाणी लाना है”
“सबको देखा बारी-बारी अबकी बारी अटल बिहारी” इत्यादि-इत्यादि….

अटल जी के श्रद्धांजलि सभा में आडवाणी जी को सुन कर ऐसा लग रहा था कि मानो शायद वो खुद में थे ही नहीं,
पहली बार उनके शब्दों को लड़खड़ाते सुना!
वो खाने की बाते कर रहें थे, पकाने की बातें कर रहे थे, खिचड़ी की बाते कह रहे थे! अगर आपने सुना होगा वो भाषण तो गौर किया होगा कि उन्होंने एक लाइन को दो-दो बार दोहराया था!
जब वो कहते है…

‘मैंने जब पुस्तक लिखी थी, अपने जीवनी की, आत्म कथा की, उसमे अटल जी का उल्लेख था’
और फिर वो एक लाइन कहते है जिनको उन्होंने -दो बार कहा,वह थी….

“और इसीलिए जब उस पुस्तक का विमोचन हुआ और उसमे अटल जी नहीं आए, तो मुझे बहुत कष्ट हुआ”
इसी बात को बाद में उन्होंने दोबारा दोहराया!
जब वो कहते है “

“वो मुझे भोजन पका कर खिलाते थे फिर चाहे वो खिचड़ी सही, मै इस बात का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ की अगर एक दिन मैंने अपनी पुस्तक लिख कर के प्रकाशित की और सार्वजानिक रूप से मै उसको वितरित करूँगा ये घोषित किया”
फिर वो कहते है….

“और अटल जी उस दिन नहीं आ सके तो मुझे कितना दुःख हुआ की अटल जी मेरे पुस्तक के विमोचन के दिन भी नहीं आए”

क्या था ये!?

उन्होंने अटल जी के हमारे बीच नहीं होने की बात अलग-अलग शब्दों में बार-बार दोहराई, कई बार तो उनके भाषण में एक खामोशी का भी अहसास हुआ!
मानो आडवाणी जी खुद में नहीं थे, शायद वो कही और भी थे उस वक्त!

65 साल से ऊपर का जुड़ाव था दोनों का।
बात चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के तौर पर बिताये दिन हो,भारतीय जनसंघ की शुरवात हो,
आपात काल के वो काले महीने हो जिसके बाद ‘जनता पार्टी’ की स्थापना हुई और या फिर 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ की स्थापना।

इन सब दौरों में दोनों का साथ हमेशा बना रहा, राजनीति और जीवन के कई वसंत और पतझड़ दोनों ने साथ-साथ देखें, जब कभी उदास या खुश हुए तो कई पिक्चरें भी साथ-साथ देखीं।
आज अडवाणी जी अपने आप में एक जीता-जागता इतिहास है।

जैसे अटल जी के जाने के बाद सारे देश ने एक भाव से यह महसूस किया की उनका नेतृत्व और मार्ग दर्शन, देश को और मिल सकता था, अगर ऐसा होता तो यह देश और देशवासियों के लिए बहुत अच्छा होता, कल यही बात हम आडवाणी जी लिए भी महसूस करेंगे……..